*मैं औऱ मेरी तनहाई,*
*अक्सर ये बाते करते हैं..*
ज्यादा पीऊं या कम,
व्हिस्की पीऊं या रम..
या फिर तौबा कर लूं,
कुछ तो अच्छा कर लूं..
हर सुबह तौबा हो जाती है,
शाम होते होते फिर याद आती है..
क्या रखा है जीने में,
असल मजा है पीने में..
फिर ढक्कन खुल जाता है,
फिर नामुराद जिंदगी का मजा आता है..
रात गहराती है,
कुछ पीता हूं,
कुछ छलकाता हूँ..
कई बार पीते पीते,
खुद ही लुढ़क जाता हूं..
फिर वही सुबह,
फिर वही सोच,,
क्या रखा है पीने में,
ये जीना भी है कोई जीने में..
सुबह कुछ औऱ,
शाम को कुछ औऱ..
*मैं औऱ मेरी तनहाई,*
*अक्सर ये बाते करते हैं।*

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